तुम्हारा नाम लिख

डाला था मैंने बादल के

छोटे छोटे टुकड़ों पर

और जानते हो फ़िर बारिश हुयी

बारिश कि हर एक बूंद पर तुम्हारा ही नाम लिखा था

और वो बूंदे सींच रही थी

मेरे तन को मेरे मन को और मेरी आत्मा को

मेरे एकांत में भी तुम्हारा प्रेम मेरे कलेजे के द्वार खटखटा ही देता है

अगर मैं इज़ाज़त ना भी दू तो मेरे सिरहाने आके बैठ ही जाता है

क्यों पढ़ लिया है तुमने मुझे किसी किताब की तरह क्या कंठस्थ करने को और कुछ नही था तुम्हारे पास?

आराधना____

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